इन दिनों कोरोना पर अपने गाए गीत को लेकर चर्चा में है. पर उसकी जीवन यात्रा बहुत प्रेरक है.
बाड़मेर के बायतु उपखंड में साधारण किसान परिवार में जन्मी सुनीता ने पढ़ाई के साथ साथ खेती भी की. विज्ञान वर्ग में सीनियर करते हुए गार्गी पुरस्कार भी प्राप्त किया. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति के अनुसार जल्दी ही जॉब करना पड़ा. पहले नर्स बनी और फिर जैसलमेर पुलिस में कांस्टेबल हो गई. अभी उसी पद पर है.
लेकिन होनी को सुनीता की परीक्षा लेनी थी. जॉब ज्वाइन करने के दो वर्ष बाद ही उसे कैंसर जैसी बीमारी ने लपेट लिया. बहादुर बेटी ने कैंसर से जमकर मुकाबला किया और जीत गई. संगीत और योग के सहारे यह संभव हो गया. उसने हारमोनियम बजाना सीख लिया. डॉ.बंशीधर तातेड़ और रजनीकांत जी शर्मा ने उसकी मदद की.
अब वह पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर पुलिस की ड्यूटी कर रही है. शरीर के भीतर और बाहर, दोनों मोर्चों पर समान रूप से लड़ी और सफल हुई है.
समाज को सुनीता पर गर्व है, राजस्थान को गर्व है, महिला शक्ति का वह प्रतीक है
पुलिस के अपने रूटीन काम के साथ सुनीता अपने जूनून में कई अन्य काम भी करती रहती है. गरीब बच्चों को पढ़ाना, सरकारी योजनाओं को आमजन तक पहुँचाना, नशामुक्ति कार्यक्रमों में भागीदारी जैसे उसके शौक हैं. पिछले साल एक हजार ट्रैक्टर ट्रोलियों पर लाल रंग वाले स्टीकर लगाकर ही मानी ताकि उनके कारण दुर्घटनाएं न हों.





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